Sunday, November 17, 2019

ब्रजकेसरी पलसों धाम निवासी स्वजन लक्ष्मी पहलवान जी का परिचय

भारत में  कुश्ती का नाम पहलवानी है जो व्यक्ति पहलवानी का अभ्यास करता है उसे पहलवान कहा जाता है। मल्लपुराण १३वीं शताब्दी में रचित एक ग्रन्थ है जिसमें कुश्ती के विभिन्न प्रकारों का वर्णन है, इसमें कुश्ती में प्रयुक्त तकनीकों की व पहलवानों के लिये विभिन्न ऋतुओं में आवश्यक खुराक की विस्तृत जानकारी दी गयी है । मल्लयुद्ध चार प्रकारों में विभाजित है जिनमें से प्रत्येक एक हिन्दू देवता या पौराणिक योद्धा के नाम पर है:- 1- हनुमन्ती तकनीकी श्रेष्ठता पर केन्द्रित है, 2- जाम्बुवन्ती प्रतिद्वन्दी को आत्मसर्मपण के लिये मजबूर करने हेतु लॉक्स तथा होल्डस का प्रयोग करती है, 3-जरासन्धी- अंगों तथा जोड़ों को तोड़ने पर केन्द्रित है जबकि 4- भीमसेनी विशुद्ध रूप से ताकत पर केन्द्रित है। कुश्ती के खेल में खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंदी को पकड़कर एक विशेष स्थिति में लाने का प्रयत्न करता है। यह खाली दम या ताकत का खेल नहीं है, बल्कि इसमें दिमाग भी लगाना होता है। हाल ही में पहलवानी और कुश्ती से जुडी दो फिल्में- ‘सुलतान’ और ‘दंगल’ काफी हिट रही हैं । अभिनेताओं और निर्माताओं ने करोड़ों कमाये हैं ।




आज हम ब्रजकेसरी ग्राम पलसोंधाम (परशुराम खेडा) निवासी व स्वसमाज के उभरते सितारे लक्ष्मी पहलवान जी का परिचय करवाते हैं जो मोहल्ला- पोठिया, गोत्र- परसैयां, बैक(फैमिली नेम) नाक वालों के नाम से जाने जाते हैं । गांव पलसों शुरूआत से ही पहलवानों का गांव रहा है लेकिन इस गांव में से पहलवानी का नाम निशान तक मिट गया था लेकिन बजरंगबली व सती मैया की कृपा से आपको यह पहलवानी की विद्या को जीवंत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ
गाँव पलसों में बचपन से ही इनके पिताजी से इन्हें पहलवानी सिखाया करते थे । बड़े होने पर लक्ष्मी पहलवान जी मथुरा में आ गये और मथुरा स्थित अखाड़ा गोपाल आश्रम पर पहलवानी का अभ्यास शुरू कर दिया ।
इन्होंने सबसे पहली कुश्ती लड़ने ये मथुरा आये थे इससे पहले इन्होंने कहीं भी कुश्ती व पहलवानी नहीं सीखी थी । एक बार जब ये अपने गांव में खेत में पानी लगा रहे थे तो एक दिन बड़े भाई के दो मित्र आए थे और जीवन में पहली बार वह अपने गाँव से बाहर मथुरा नगर उनके साथ गए । मथुरा में जा करके उन्होंने कुश्ती लड़ाई । जीवन में पहली बार मथुरा में 5 कुश्ती लगातार लड़ी और विजयी रहे । जब आप मथुरा चैंपियन बन गये तो घर घर वालों ने आपको छूट दे दी । इसके बाद पहलवानी के लिए मथुरा शिफ्ट हो गए।
 एक बार आप अपनी समाज के गांव खुर्द नवाबपुरा बरेली के पास सिरोली गांव में भी लड़ने के लिए गये थे । आपको बढ़ावा देने के लिए समाज के कई लोगों का हाथ है इन्होंने आपको आगे बढ़ने में मदद की है जब आप कई दिक्कतों का सामना कर रहे थे जैसे खाने- पीने का इंतजाम नहीं था जोकि आपको चाहिए था तब सहारा देने वाले श्रीमान हरीश शर्मा जी जो नोएडा में रहते हैं जिन्होंने 20 किलो घी देकर सम्मान किया । आपके पिताजी आपसे कहा करते थे की छोटी-मोटी कुश्ती लड़ता रहता है पहलवान तो तुझको जब मानूं कहीं से "गुर्ज जीत" कर लाए लेकिन दुख की बात यह है कि आप "गुर्ज" जीतकर तो लाये लेकिन उसको देखने के लिए आपके पिताजी नहीं रहे । पहलवान जी के शब्दों में, " पिताजी की एक और खासियत थी कि वह मेरे आगे कभी भी मेरी प्रशंसा नहीं करते थे और वो इसलिए नहीं करते थे कहीं में अभिमान में ना आ जाऊँ । पिताजी की बात मैं अन्य दूसरे लोगों से सुनता था, लोग कहते थे कि तेरे पिताजी तेरी बहुत प्रशंसा करते हैं लेकिन मैं सोचा करता था कि मेरे आगे तो कुछ अलग ही प्रतिक्रिया दिया करते थे कि तू कुछ भी नहीं है तेरे जैसे हजारों हैं यहां पर । जिस दिन मैं "गुर्ज" जीतकर लाया था वह "गुर्ज" सबसे मेल पहले मैंने पिता जी की समाधि पर रखा था । फिर मैं सती मैया के मन्दिर गया और विनती की, आप मुझे कहीं से गुर्ज अथवा आखिरी कुश्ती दिलवाओ मैं आपके लिए भी गुर्ज चढ़ाना चाहता हूँ, सती मैया की कृपा ऐसा ही हुआ । इससे तीसरे दिन ही अमरनाथ कॉलेज की बगल में मुसलमानों की बस्ती में दंगल लग रहा था वहां पर मेरी आखिरी कुश्ती हुई और मैंने बहुत ही अच्छे पहलवान को अपने से दोगुने सीनियर पहलवान को पछाड़कर "गुर्ज" जीत लिया और सती मैया के चरणों में समर्पित कर दिया । फिर बाद में मैंने कई कुश्तियां जीती और सती मैया की कृपा से कहीं भी हार का मुंह देखना नहीं पड़ा ।"

आप घर में सबसे छोटे हैं सभी परिवारीजन बहुत प्रेम करते हैं और डाइट का बड़ा खयाल रखते हैं । आप शान्तिप्रिय हैं लेकिन अपने परिवार के बारे में व दोस्तों के बारे में आप कुछ भी गलत सुनना पसंद नहीं करते।
 जीवन में आपने बहुत संघर्ष किया लेकिन अपना रास्ता नहीं छोड़ा और ना ही रास्ते से भटके । पहलवान जी के शब्दों में " मैं यह सब सभी आदरणीय व आदर्शवादी स्वजनों के आशीर्वाद से कर पाया । मैं मानता हूं अभी मैं कुछ भी नहीं हूँ, मैंने पैसा भी नहीं कमाया है लेकिन मैं समाज के नाम के लिए हमेशा अग्रसित रहता हूँ और एक अनोखी बात ये है मेरे घर वाले मुझे सपने में भी कुश्ती लड़ते हुए देखते हैं । वो कहते हैं चैन से सो जाया कर, रात में भी दिलोदिमाग पर छाया रहता है ।"
आप बजरंगबली के बहुत बडे भक्त हैं । गांव पलसों में होने वाली रामलीला मंचन में आप वीर हनुमान जी का रोल करते हैं । यह आपका सपना भी था की हनुमान जी का रोल करूं और आप वाकई इस चरित्र के लिए सक्षम हुए तो 'रामलीला कमेटी पलसों' द्वारा रोल दे दिया गया और और आप अपना रोल बहुत अच्छी तरह निभाते हैं ।
आपका एक ही उद्देश्य है कि इस समाज के लिए, अपने क्षेत्र के लिए, अपने देश के लिए गोल्ड  मेडल जीत कर लाना ।
 वर्ष 2019-20 में आपने जिले के सबसे बडे पुरुस्कार "जिला केसरी, जिला भीम" हासिल किये और आपकी खास बात कि आपने जिले में आयोजित "मथुरा चैंपियन कुश्ती प्रतियोगिता"कभी भी नहीं हारी । कुश्ती लड़ने के दौरान आप को कई चोटें आयी लेकिन आपने हिम्मत नहीं हारी और अपने लक्ष्य की दृढ़ता से चलते रहे ।
बकौल पहलवान जी, "मुझे किसी और लोगों के साथ में फोटो खिंचवाने में आनंद नहीं आता जितना मेरा स्वसमाज के लोगों के साथ में फोटो खिंचवाने में आनंद आता है । हरीशशर्मा जी, शोभाराम शर्मा जी, दिनेशशर्मा जी, चित्रा शर्मा व "अखिल भारतीय सौभरेय ब्राह्मण संघ" के सभी आदरणीय व्यक्ति समय-समय पर मेरा उत्साह वर्धन करते रहते हैं । आपके मार्गदर्शकों में से एक महत्वपूर्ण स्वजन वासु शर्मा जी भदावल वाले जोकि समय-समय पर आपका मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन करने से नहीं चूकते । अपने आपको सौभाग्यशाली और इसलिए समझता हूं की समाज के कई आदरणीय व्यक्ति जिनसे मैं आज तक नहीं मिला वो आकर पीठ-थपाथपाते हैं और कहते हैं कि आपने स्वसमाज का नाम रोशन करने ने सहभागिता अकिंत की है । मैं गरीब घर से हूं और जो कोई मेरी सहायता करता है व मेरा साथ देता है मैं उनका सदैव तन मन धन से आभारी रहूँगा । मुझे एक बार सती मैया के मेले पर दाऊजी के स्वजनों ने सती मैया के मेले पर 5100 रुपए और पटका डालकर स्वागत किया था मुझे आगे बढ़ाने में उनका भी बहुत बड़ा योगदान था ।"

उत्तरप्रदेश कुश्ती में आपका तीसरा स्थान आया था जो कि स्वसमाज के लोग उससे ज्यादा रूबरू नहीं हो पाए । धीरे-धीरे गाँव के दंगलों से लेकर शहरों तक में ताबड़तोड़ कुश्तियाँ जीतकर अपने गाँव व समाज का नाम रोशन किया है । आप 'बल और शक्ति' के पर्यायवाची जैसे बन गये हो ।

आपने बाहर तो बहुत नाम कमाया, पुरुस्कार भी जीते लेकिन आपको स्वसमाज द्वारा भी "सौभरि ब्राह्मण गौरव" से नवाजा जाना चाहिए । आप उसके हक़दार हैं ।

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा


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Wednesday, July 17, 2019

Palson Village

पलसों गाँव-
पलसों गाँव सती स्वरूपा ‘श्री हरदेवी जी’ की कर्मस्थली व पुण्यस्थली है । यह गोवर्धन-बरसाना रोड़ पर स्थित गांव पलसों ‘परशुराम खेड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है । शुरुआत से इस पावन गांव से बड़े-बड़े पहलवान होते रहे हैं । वर्तमान में तहसील गोवर्धन व छाता में पड़ने वाले सौभरि ब्राह्मण समाज के गांवों में जनसंख्या व क्षेत्रफल के हिसाब से दूसरे स्थान पर है ।
आसपास के गाँव जैसे, मडोरा, महरौली, भगोसा, डिरावली, छोटे नगले पलसों गांव की सीमा से लगे हुए हैं । गांव में उपगोत्रों के हिसाब से ‘परसईयाँ’ गोत्र बहुलता में पाया जाता है । 
गांव के समीप ही गोवर्धन- बरसाना सड़कमार्ग पर ‘श्री हरदेवी जी ‘ का मन्दिर बना हुआ है । पलसों एक बर्ष अंदर दो मेलों का आयोजन कराने वाला इकलौता स्वजातीय गांव है । होली के मेले का आयोजन चैत्र कृष्ण तृतीया को तथा ‘श्री सती हरदेवी जी’ का मेला श्रावण मास की शुक्ल अष्टमी को होता है ।


                        पलसों गांव का नक्शा

गांव के प्रवेशद्वार स्थित श्री शंकर इंटर कॉलेज आज भी शिक्षा के मामले में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है ।
गांव के पास ही पेट्रोल पंप व बैंक भी है जो लोगों जनसुविधा के हिसाब से आदर्श गांव की ओर इंगित करता है । गांव के बाहर चारागाहों की तरह पशुओं के बैठने का भी पूरा इंतज़ाम है जिसे ‘राहमीन’ कहते हैं ।
एक वृतांत के अनुसार परसों अथवा पलसों नामक गाँव गोवर्धन-बरसाना के रास्ते में स्थित है। ब्रजमण्डल स्थित भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों में से यह एक है। जब अक्रूर जी, बलराम और कृष्ण दोनों भाईयों को मथुरा ले जा रहे थे, तब रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण ने गोपियों की विरह दशा से व्याकुल होकर उनको यह संदेश भेजा कि मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि परसों यहाँ अवश्य ही लौट आऊँगा तब से इस गाँव का नाम परसों हो गया।


:ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलाँ 【(गोवर्धन) मथुरा】





सौभरि वंशज

Maa Sati HarDevi ji Ki Aarti

*सती हरदेवी मैया जी की आरती*



आरती मैया की गामें , सत्य दरबार बतलावें ।
सौभरि वंश में भाई , प्रगट माता भाई आई ।।

नाम हरदेई बतलावें ।। 1 ।। आरती

जन्म जो खायरे लीयो , व्याह फिर भक्त संग कियौ ।

नहीं पहचानि में आवें ।। 2 ।। आरती

गांम परसों में जो आई , दई संतानी प्रगटाई ।

अनोखे रूप दर्शामें ।। 3 ।। आरती

लांगुरा लांगुरी भाई , ज्योति सी दई दिखलाई ।

ख्याल नहीं हमें काया में ।। 4 ।। आरती

लड़ाई लड़न जो वारी , लड़त में कभी नांय हारी ।।

भुलाये क्रोध माया में ।। 5 ।। आरती

पति नें देह तजि दीनी , शांति प्रगट तन किन्हीं ।

क्रोध कूँ तिरांजली धामें ।। 6 ।। आरती

बात जो सुनि लई सबकी , क्रोध में नेंक नांई भावकी ।।

शांति बसी काया में ।। 7 ।। आरती

पती की भस्म पर जाई, देह में अग्नि प्रगटाई ।

रूप जब कई दिखलामें ।। 8 ।। आरती

कुंचा ते दूध धार आई , कलू में शक्ति दिखलाई ।

दर्श कर भक्त हरसामें ।। 9 ।। आरती

सुगंधी देह में आमें ।। 10 ।। आरती

ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा

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Satiswarupa Maa Sati HarDevi Ji Ki Katha

शिवशक्ति माँ सती हरदेवी – 
सती अनुसूइया और माता सीता जैसा पतिव्रतधर्मी होना कलयुग में अत्यंत दुर्लभ है, यदि कोई है भी तो इनकी शक्ति उन्हीं के समतुल्य है । हमारे देश में सतीत्व को आदिकाल से ही स्त्री का आभूषण माना जाता रहा है ।
भारत भूमि पर चमत्कार पर चमत्कार अनादि कल से ही होते आये हैं,जिसमें ब्रजभूमि का स्थान अग्रिम रहा है |
बात सन 1980 की हैं जब एक हूबहू चमत्कार हुआ था | इतना बड़ा आँखों देखा चमत्कार, शायद देश की आजादी बाद हुआ हो | ब्रज मंडल के जिला- मथुरा,तहसील -गोवर्धन थाना -बरसाना गांव-पलसों (परशुराम खेड़ा ) में एक दिव्यांगना, ‘जिनका नाम शिव शक्ति हरदेवी जी’ ने स्वयं माँ पार्वती के रूप की झलक, साधारण नर- नारियों के बीच दिखाई | वाक़या कुछ इस तरीके से है –



गांव खायरा (बरसाना के पास ) में एक ‘सौभरि ब्राह्मण’ परिवार में जन्म लिया | बचपन से ही पूजा भावना में बड़ी लग्न थी |एक साधारण परिवार में जन्म लेते हुए और अपनी साधारण छबि को दर्शाते हुए, अपने मायके में ये खबर न होने दी की कोई दिव्यशक्ति का आगमन हुआ है |धीरे धीरे समय बीतता गया और शादी लायक हुई तो घर वालो ने वर ढूढ़ना प्रारम्भ किया और इस तरीके से ग्राम पलसों में से वर का चयन कर दिया गया |शादी होने के बाद दो बच्चे और २ बच्चियां हुई और जिंदगी सब ठीक ठाक चल रही थी| समय बीतते -बीतते उनके पति जी के महामारी हो गयी अचानक उनके जीवन ने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया, मानो मुसीबतो का पहाड़ टूट पड़ा हो |उपचार कराने बाद भी वे शौहर को ना बचा सकीं |जब की अंतिम संस्कार बारी आयी तो माँ हरदेवी जी मृत शरीर को अपने गोदी में रख कर अंतिम संस्कार के लिए जाने पर अपने सती होने का मनोभाव जताने लगीं |लेकिन ये बात किसी ने स्वीकार नही की क्योंकि ‘अभी बच्चे भी छोटे छोटे हैं’ इनकी तरफ भी तो देख लो, इस तरह आसपास के लोगो ने समझाया |लेकिन वो मानने को तैयार नही हुई और अपनी अंतिम यात्रा का भूत, सभी के सामने पेश कर दिया की मैं अपने पति संग सती होउंगी |ये सुनकर सब सन्न रह गए और कोहराम बढ़ गया |लेकिन जैसे-तैसे मृत शरीर को श्मशान तक ले गए और दाह संस्कार किया |लेकिन ऊपर धड़ वाला हिस्सा जला ही नही क्योंकि जिस जगह शिवशक्ति हरदेवी जी के हाथों का स्पर्श हुआ वहाँ से वो भाग बिना जले रह गया |लोगो ने खूब जलाने की कोशिश की पर सब नाकामयाब |आखिर उस हिस्से को गंगा में विसर्जन करने के लिए लोगो ने सुझाया |उधर हरदेवी जी का मन पूरी तरह से विरक्त हो चूका था और माने नही मान रही थी |उनके इस अवस्था को देखकर जिला चिकित्सालय को ले गए |वहाँ भी वही खुमार, न कोई दवा काम करे और न ही कोई सुझाव |घटना धीरे-धीरे विकराल रूप लेता जा रही थी |जिले के बड़े-बड़े अधिकारी आ चुके थे उनके कुछ समझ नही आ रहा था | उधर गंगा गए लोगों की तरफ से सूचनाएं आती हैं कि वो “ना जला हुआ हिस्सा” बार बार गंगा के तट कि ओर आ जाता है और पानी के साथ नही बह रहा है | तो लोगों को और प्रशाशन को विश्वास हो गया कि कोई ना कोई चमत्कार तो है और उस हिस्से को बापस लाने को बोल दिया गया | | लेकिन ये भी था कि भारत में सती प्रथा का चलन बंद और गैरकानूनी हो गया था तब उस समय इस घटना के विरुद्ध प्रशाशन भी आने लगा | अंत प्रशाशन को झुकना पड़ा और हरदेवी जी को बापस पलसों गांव लेकर आगये |
गांव के निकट एक मंदिर था उसमें उन्होंने अपना ध्यान लगाया,उसी समय वही पर एक बाबा आये जो बिलकुल अजनबी थे उन्होंने हरदेवी जी को सती होने की रीति रिवाज से वाकिफ कराया | और थोड़े समय बाद ही वहाँ से अंतरध्यान हो गए |उनको साक्षात् शिव का रूप बताते हैं | फिर तो उसके बाद हरदेवी जी ने पूरी तरह श्रृंगारयुक्त होकर अपने पति के उस भाग को लेकर उसी जगह जहाँ उनके शौहर कि चिता थी वही समाधि लगाकर बैठ गयी | ये सारा कोतुहल, वहाँ के और दूर -दूर से आये हुए लोग और साथ में पुलिस प्रशाशन भी, देख रहे थेे और इस घटना के गवाह बन रहे थे | वहाँ खड़ी भीड़ से वो कुछ कहना चाह रही थी लेकिन लोग सब जय जयकार के नारे लगाने कि वजह से सुन नही पाए | देखते ही देखते अपने दोनों हाथों को रगड़ते हुए अग्नि उत्पन्न की और अग्नि धीरे -धीरे नीचे से पूरे हिस्से में पहुँचने लगी |पल भर बाद उनके बैठने की स्थिति बिचलित हुई लोगों ने बांस के सहारे उसी स्थिति में लाने की सोचते, ‘कहीं उस से पहले ही’ वह यथावत हो गयीं | फिर इसके बाद लोगों ने घी डालना शुरू कर दिया, जयकारों से सारा क्षेत्र गूंजने लगा |जिसने भी सुना वह उसी स्थिति में भाग भाग के वहाँ पहुँचने लगे | और जिस समय ये घटना हो रही थी उसी समय वहाँ जगह-जगह ” केसर” की वर्षा हुई | साक्षी बताते हैं की उस समाधि वाली जगह पर कई महीनों तक अग्नि की लौह जलती रही | आज वहीँ पर उनकी समाधि बनी हुई है और मंदिर भी | वो जगह पूजनीय हो गई वहाँ बाहर से बड़ी दूर -दूर लोग आज भी मथ्था टेकने आते हैं सन २०१२ से श्रावण मास की अष्टमी को एक मेले का आयोजन होता है | उसका जिम्मा पूरे ग्रामवासी उठाते हैं | कलियुग में चमत्कार करने वाली ऐसी मातृशक्ति, शिवशक्ति को कोटि कोटि नमन करता हूं |




साभार:-
पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलाँ, गोवर्धन (मथुरा)

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